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“नीम पर सुग्गा”

भोजपुरी कहानी (जोहार भोजपुरिया पत्रिका में 2022 प्रकाशित)
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“पाव लागिले बाबा,,,, बड़ा मोसकिल से फेसबुक पर राउर नंबर मिलल हऽ,,,, हमरो के अपना सरन में राखीं, बड़ा गरीब परिवार के बानी, बहुत दिन से एस्ट्रगल चल&ता,,, तनि असीरबाद दे देतीं तऽ बड़ी उपकार होइत!”,,,
बाबा के फोन पर अनजान नम्मर से कॉल आइल रहे। बाबा पूछलें – “बाबू हम चिन्हत नइखीं, कहाँ मकान पड़ी?? ट्रू कालर तऽ रामू रसिया नांव बतावत बा,, असल नाम ईहे बा आकि कुछ दोसर?” अबकी ओने से तनि अउर फरहर आवाज आइल – “ना चिन्हनी बाबा?? हम डमरू राम के नाती हईं, रउवे गांव के, सिवान में रहके कोचिंग करेनी…”
एही तरे पहिल परिचय साढ़े चार बरिस पहिले भडल रहे रामू आ साधु बाबा के। साधु बाबा जाति पाति के भेदभाव भा ऊंच- नीच के छुआछूत कबो ना मानत रहन। बाबा के अइसन सुभाव के चलते जवार भर के पंडीजी आ बाबू साहेब भीतरे भीतर गभुवातो रहे लोग बाकिर बाबा के विद्वता के धाक के सोझा कबो सामने से बिरोध करे के केहू के बेंवत ना परल। तबो पीठ पाछे बतकही त5 बरमसिया चलत रहल। “अरे ई बराहमन के नाम पर कलंक बाड़ें जी,,, चमारन के अपना संगे उठावत बइठावत बाड़ें,, ई साधु बाबा ना, खाली ढोंग ढकोसला धइले बाड़न।”
साधु बाबा कबो कवनो बिरोध के परवाह ना कइलन। काहे कि इनिकर बाबूजीओ बिनेसर बाबा बड़ी बेवहारिक आ आधुनिक सोंच के परोपकारी अदिमी रहन। बीसन बरीस पहिले ताड़ी पीके काली जी के मंदिर के अहाता तर लबनी धइला खातिर संवसे गांव जब डमरू राम के उपर पंचाइत कऽ के सय गो रूपिया भा दस लाठी हरजाना लगावल तऽ अपना पिनसिन के पइसा से बिनेसर बाबा खुद हरजाना भर दिहलें बाकि डमरू पर एको लाठी ना गिरे दिहलें। साधुवो बाबा बापे पर गइल बाड़ें। इनिके सह पर रामू दिल्‍ली गइल रहे। तीन बरीस पर रामू एक हफ्ता पहिले गांवें लवटल। बिहान भइला पूरा चमटोली के लइकन के लेके बुलू झंडा के साथे गांव में जुलूस निकलल। इसकूल – बाजार के सगरो देवाल “जय भीम – जय भीम” आ “अपना हक लेके रहेंगे” जइसन नारा से रंगा गइल। ई सब देख के ठकुरान आ मिसरान के नवछेड़ियन में एक दू दिन ले भीतरे भीतर फेरू लुत्ती सुनुगे लागल।
आज सनीचर रहल ह$। साधु बाबा भोरहीं बैजनाथ धाम से जल ढार के लवटल रहुवन। कादूं उनुकर कवनो जोतिसी चेला साल भर पहिले बतवले रहे,, कि साधु बाबा पर सनि के साढे साती चल$ता। हर सनीचर के करिया तील सनी महाराज के चढाईं आ सनीचर के नीमक बरा दिहल करी, बाकिर साधु बाबा कबो ई कुल्ह के अंधविश्वास आ ढकोसले मनलन, जवना के चलते जोतिसीयो समाज साधु बाबा से नाराजे चलत रहल ह$। बाकिर साधु बाबा ‘सारा मनई एक समान’ के विचारधारा में सनाइल सपना दिन दुपहरियो में देखत रहन। बाबा धाम के परसादी अबहीं अपने टोला में बांटते रहन, तब ले पता चलल कि काली जी के मन्दिर तर पंचाइत बिटोराइल बा। बड़ी तनाव के माहौल बा। ‘जय भीम’ आ ‘जय परसुराम’ के हाल्ला पछुवा हवा के संगे गांवो में ले सुनाई दे रहल बा। साधु बाबा के बाबा धाम के जतरा से थाकल गोड़ में ना जाने कहां से अतना तागद आ गइल। झटकारे गोड़े काली जी किओर बढलन। जय भीम जय परसुराम अउर तेज होत गइल। मंदिर के अहाता तर इनिका पहुंचते दुनू काओर कुछ पल खातिर गुम्मी बन्हा गइल। साधु बाबा आपन नेह के हक रामू पर बेसी समुझ के पहिले ओकरे काओर बढलें। “का बेटा, ई कुल्ह का हो रहल बा?? आ काहे खातिर??”
“ऐ पंडित! नवटंकी बंद करऽ।” आँख तरेरत चिलाइल रामू,
“हजारन साल से तु लोग हमनी पर अतियाचार कर रहल
बाड़ऽ अब दलित चेतना जाग गइल बा, कपटी बराहमनन के सर्वनास करके हमनी आज अपना पुरखा के बदला ले के रहब।” तबले जहां काली मंदिर में ‘नीमिया के डाढि मइया’ गूंजत रहे, ओहिजा फेर एक बेर ‘जय्य भीम!!!नमो बुद्धाय!!!.  के तेज नारा लागल। साधु बाबा के लागल कि ठकुआ मार देलस। देह दिमाग दुनू सुन्न। एह से पहिले कि कुछ समुझ पइतें, खुलल आँख से देखले साधु बाबा ‘जय परसुराम – जय भीम’ करत दुनूं किओर से लाठी तेरूवार फेरसा चल रहल बा। गुत्थम गुत्थी – गारी गलौज। तले एक बएक बंदूक चलला के तेज आवाज आइल। ठांय्य!! बुझाइल कि धरती दलक जाई। सभे देखल कि गोली के आवाज सुन के नीम पर बइठल एगो बड़हन सुग्गा खूब तेजी से पांख पसारत उड़ के पछिम काओर चलि गइल। सगरो सन्नाटा पसरल बा। साधु बाबा छाती में गोली लागला से छपिटा के गिर गइल बाड़न। सगरो खून पसरल बा। दुनो गोल अब छितरा के एने ओने घसके लागल बा। डमरू राम साधु बाबा के निष्प्राण चेहरा बड़ी ध्यान से देखलन। कुल्ह खून अहाता तर ओजुगे बह के जमा हो गइल बा, जहां बीस बरीस पहिले ऊ ताड़ी के लबनी रखले रहन। कांपत थरथरात हाथ जोड़त डमरू के मुंह से निकलल – ‘हमरा नाती के माफ कऽ देहब, साधु बाबा!” एतना कह के डमरूओ परान तियाग दिहलें। नीम पर से एगो आउर सुग्गा फेर उड़ल आ पछिम काओर आकास में जाके बिला गइल।

भखुआ खोंसी

भोजपुरी कहानी ( ‘हेलो भोजपुरी’ पत्रिका के जनवरी 2014 अंक में प्रकाशित )
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रजमतिया के अपना आँख प बिसवासे नइखे होखत। कहीं ई कवनो सपना त ना ह। काल्हुवे जवना खोंसी के सउंसे गाँव मिल के ईस्सर बाबा के भारा चढ़ा देहल, उहे आज आंखि के सोझा जियतार खड़ा बा। खुबे सुन्नर उज्जर केस वाला झाबरा खोंसी।
एह खोंसी में रजमतिया के परान बसल रहे। करेजा में साट के अपना बेटा नियन ऊ एह खोंसी के मनले रहे। गाँव भर के पाप आ कुकरम से ईस्सर बाबा के प्रकोप जब आगलग्गी आ हैजा रूपी बिपत के रूप में पड़े लागल त सभे मिल के पंचाइत कइल। चइती अमावस के ईस्सर बाबा के मंदिर में खून चढ़ावल जाई, तबे ई प्रकोप शांत होई। पुजारी जी बड़ा गंभीर होके समझवलें – देखऽ लोग! ईस्सर बाबा के अगर जल्दी ना खुश कइल जाई त ऊ सउसें गाँव के भसम क दिहें। रोज खून के उल्टी होई, केहू के जवान बेटा मरी त केहू के कोढ़ फुट जाई। तरह तरह के तकलीफ आसमान से बरसी। अपना पूर्वज के बदनेकी आ आपन पाप दुनो के सजाय तोहरा लोगन के संतान सहित भोगे के पड़ी। इहे हर धरम के किताब में लिखल बा। अदिमी के आपन पाप के बदले ईस्सर बाबा के लगे बलि चढ़ावे के चाहीं, तबे हिसाब-किताब चुकता होखेला। बलि के रूप में चाहे कबूतर, सुअर, खोंसी भा भंइसा, कुछो चढ़ावऽ, बाकि ओकर खून शुद्ध होखे के चाहीं…. कुछ देर ले पुजारी जी बलि के बिषय में ना जाने का का बतावत गइलन।
गाँव भर में चर्चा के एके गो बिषय रहे- ईस्सर बाबा के चढ़ावा। सभे अपना-अपना बात बुद्धि के अनुसार चढ़ावा जुटावे के जोगाड़ में लाग गइल। रजमतिया के मन बड़ी दुविधा में परल रहे। निहछल मन के रजमतिया के घर टोला के लोग भलहीं ‘बउकी बउकी’ कहत रहे बाकिर रजमतिया अपना नजर में बड़ी अकिलान्ता रहे। कवनो बात पर बड़ी पूछताछ करे के ओकर सुभाव लरिकइंये से रहे। गाय के गोबर से दालान लीपत-लीपत ऊ सोंच में डूब गइल- गाँव के हाल त पर्हो अइसने रहे। जबसे होश सम्हरलस, तब से साइते अइसन कवनो साल होई जवन नीमन से गुजरल होखे। हर साल आगलग्गी, हैजा, मिर्गी, अकाल, बाढ़ मउअत, .. दुःख – दुःख आ खाली दुःख के बरसात। हर साल पूरा गाँव दारू, कपड़ा, अनाज, कबूतर, सूअर, खोंसी आ भंइसा चढ़ावेला। हरेक साल एगारे दिन के बिघिन शांति महाजग होखेला। गाँव के चिरई चुरुंग ले ‘शांति वाचन मंत्र ‘ॐ शांति’ गावत फिरेलिसन। तबहूँ गाँव में शांति ना आइल। ईस्सर बाबा के प्रकोप जस के तस बनल बाटे। बरिसन से चलल आ रहल महाजग आ बलि के परम्परा फेर एहू साल मनावल जाई। मगर फायदा???
पूरा दालान लीप के रजमतिया गोड़ – हाथ धोवे भूतहा ईनार पर डोरी बाल्टी लेके चलल। ओकरा निर्दोष मन में आज द्वंद्व के लहर उफान मारत रहे। कय बेर ऊ ईहो सोंचलस कि जाके पुजारी जी से पुछो, बाकिर लोक लेहाज के बेड़ी ओकरा गोड़ में आ धार्मिक मरजादा के चिप्पी ओकरा मुंह पर सटा गइल रहे। बाल्टी में हाथ डूबाके भर-भर अंजुरी पानी अपना चेहरा पर मारे लागल…छपाक…. छपाक… पानी ओरइले पर ऊ थमल। बाल्टी डोरी ईनारे प छोड़के साड़ी के आंचर से मुंह पोंछत बड़ी बेहोसी में फेरु दालान का ओर लवट चलल ।
गाँव भर के जनावरन में हड़कंप मच गइल। सभका अपना-अपना महतारी के खर्ह- जिउतिया मन परे लागल।
सुअरी :- सांचहूं में घोर कलजुग आ गइल बा। पर्ह चइती अमावस के हमरा दुलरुवा भाई के कूल्ह जने मिल के हतेया क दिहलें। इंसान आपना भा आपना पुरखा पुरनिया के पाप के बदले हमनी के खून कइसे कर सकेला।?
खोंसी:- अरे पगली! तोरा नियन अछूत के अशुद्ध खून चढ़ावला से ईस्सर बाबा आउर नाराज हो गइल बाड़न, एहिसे हर साल उनकर परकोप बढ़ते जाता…देखत नइखू?
कबूतरः- ए भइया! ईस्सर बाबा त दुनिया के मालिक हउवें। ऊ हमनी निर्दोष जनावरन के कुरबानी से खुश होके भला कइसे एह गाँव के पाप छेमा कर सकेलें। सृष्टि के रचे वाला दयालु परमात्मा एतना निर्दई नइखन हो सकत।
सुअरीः- बाकिर ई बात एह गाँव के गंवारन के समुझ में आवे तब नु । ई त हरेक साल हमनी के बाप-भाई – बेटा के हतेया क के आपन पाप अउरी बढ़वले जात बाड़ेसन। अब देखऽ लोगिन एह अमावस में केकर नम्मर बा। हे ईस्सर बाबा! रक्षा करीं।
रजमतिया के गोड़ दालान में पड़ते ठिठक के रोक गइल। ई का….। अचरज से आँख फाटे लागल। जबरन साड़ी हाथ में लेके मुंह ढांप लेलस। दालान के बीचो बिच उज्जर झब – झब चमकत रोवां आला गोटाइल पठरु (खोंसी) खड़ा बा। एकदम मस्त झबरा, चुपचाप मुस्करा रहल बा। आज से पहिले ई कबो कहीं नइखे लउकल। ई केकर खोंसी हो सकेला। साईत बलि के डर से जान बचावे खातिर ईहां भाग के आ गइल बा। रजमतिया धीमा गोड़ से ओकरा तरफ बढ़ल। खोंसी जस के तस मुसकुरात खड़ा बा। ओकरा आँख में एगो जादू बा। रजमतिया खोंसी के कोरा में उठा के चूमे लागल, जईसे कवनो माई अपना बेटा के खेलावेले।
अचके एगो बड़ी साफ आवाज रजमतिया के कान में परल….’जाके गाँव भर से कह दऽ जे सभे खुशी मनाओ। ईस्सर बाबा दया देखा देले बाड़न। रजमतिया के झुमत गोड़ थथम गईल। खोंसी के कोरा से उतार के भुईयां खड़ा कइलस। एने-ओने मुड़ी उठाके ताके लागल- ई आवाज कहाँ से आईल ह ए दादा… एहिजा दालान में ढुक्का लाग के कवनो देखत त नईखे? हाली-हाली दउर के पलानी के पीछा, अमरूद के आड़ा, सगरो निरेख लेहलस। केहू ना मिलल। ‘ए माई! एहिजा देखs, हम हईं, तहार दुलरुआ …. रजमतिया के अचरज आसमान छुवे लागल- अरे! ई त पठरुआ बोलऽता! आदमी के बोली में!
रजमतिया के लागल जे ओकरा केतना बड़ा धन भेंटा गइल बा। हाली से ऊ खोंसी के कोरा में उठाके अपना आंचर से तोपे लागल | एगो त सऊँसे देह उज्जर खोंसी हाली भेंटाला ना, दुसरे में केहू के नजर पड़ी त एकरो के ईस्सर बाबा के दुआरी ले जाके रेत दिहें सं। एही भय में ऊ खोंसिया के अपना सीना से आउर चिपका के हाली – हाली घर काओर डेग बढ़ा देहलस।
सोंचलस जे घरहीं में एकरा के हमेसा छइंटा से तोप के राखब। घरहीं में घास खियायेब, कबहूँ बहरी चरावे के ना ले जायेब। जिनिगी भर खातिर भगवान हमरा के एगो संघतिया दे देले बाड़न। बाकिर एकरो के अगर केहू छीन के भारा चढ़ा देवे त… ???
सोंच के कांप गईल रजमतिया | कवनो अनहोनी के आशंका आ खुशी दुनो भाव में डूबत-उतरात अबहीं कुछे दूर गइल होई कि… ‘ए माई। तोहसे कुछ जरुरी बात कहे के बा, एजुगे रूकऽ… डेरा मत’ आंचरा के भीतर से खोंसिया बोललस। घबराइल आ चिहाइल रजमतिया ओकरा के कोरा से उतरलस आ भुइयां खड़ा क के ओकरा समनवे बइठ गइल। खोंसी बोले के शुरू कइलस-
ए माई! हम जवन कहतानी, ऊ ध्यान से सुनऽ… हम तोहके माई जरुर कहतानी बाकिर हमार बाप खुदे ईस्सर बाबा हउवन। हम उनुके बेटा हईं। गाँव भर के कुकरम से जवना पाप के बोझा लदाइल बा, ऊ अइसे ना मेटी। सउंसे गाँव कुल्ह कुकरम, हतेया, झूठ, चोरी भीतरे भीतर करेला आ बदला में कुछ पइसा भा सुअर, बकरी चढ़ा देला। हमरा बाबूजी (ईस्सर बाबा ) के ई तनिको पसंद ना पड़ेला। बाकिर एह गाँव के हरेक बेकती से ऊ प्रेम करेलन। उनकर तनिको ईच्छा ना ह कि एह गाँव के केहू पर कवनो बिपत परो। एहिसे ऊ हमरा के भेजले हं कि अबकी चइती अमावस के पूरा गाँव मिलके हमार बलि चढ़ावे, तब गाँव के पराछित मेंटी। काहे कि हम ईस्सर बाबा के बेटा हईं | हमार खून पबितर बा। सउंसे गाँव मिलके जेतना पाप कुकरम कइले बा, ओ कुल्ह लोग के जवन सजाय आ पीरा मिले के चाहीं, ऊ सब हमरा भोगे के बा। बाबूजी के ई आदेश बा। रजमतिया के माथा ई सभ सुन के चकराए लागल। ऊ डांट के परल खोंसी पर – ई का कुल्ह अशुभ – अशुभ मुंह से कढ़ावतारऽ, खबरदार, अब जे एको अछर बोललऽ त” खोंसी मुस्कुरा के बोलल- माई! हम तहरा बिछोह के बुझतानी। बाकिर पूरा गाँव के बचावे खातिर
हमरा मुअहीं के परी । उहो साधारन मउवत ना। बड़ी दर्दनाक मउवत । बाकिर तू फिकिर जनि करs, हम बिहान भइला फेरु जी जाइब। आ ओकरा बाद से बाबूजी (ईस्सर बाबा) पूरा गाँव के छेमा क दिहें।
जंगल के आग नियन ई बात पूरा गाँव में पसर गईल। चइती अमावस आ गइल। पंडीजी के फरमान जारी भईल कि ‘रजमतिया के खोंसी छीन लेआवऽ। ऊ खोंसी कवनो अशुभ के संकेत बा।’ सभ लइका रजमतिया के हाथ से खोंसी के छीन के गर्दाही (रसरी) से घिसियावत मंदिर का ओर ले चलले सं। कवनो छिउंकी से मारता… त कवनो ढेला से… आगे आगे झबरा खोंसी घसेटात-पीटात, खून से लथपथ, घावाहिल, लंगड़ात, धीरे-धीरे चलत रहे, पीछे-पीछे लइकन के लेलकारी, मेहरारुअन के झुण्ड। घाम बिखिये भइल रहे।
सब ले पीछा रजमतिया बउराहीन लेखा फेंकरत, खोंसी के पीछा – पीछा। लोर के पवनार बहत रहे। केश छितराइल बा। साड़ी सम्हारे के सहूर ना रहल। अइसन लागे जइसे केहू ओकर करेजा निकाल के ले जाता। खेतन के पगडण्डी धांगत सऊँसे भीड़ ईस्सर बाबा के मंदिर पहुंचल। पीयरी धोती में पूजारी बाबा दुनो आँख के बीचे लाल टीका कइले रहन। खोंसी मंदिर के केंवाड़ी के ठीक सामने वाला चबूतरा पर बान्हल गइल। बगले में नीचे एगो झांवां (जरल ईंटा) पर कलुवा चमार आपन तेरुवार पिजावत रहे। मंदिर के ओसारा में कुछ मेहरारू ईस्सर बाबा के गीत गावत रहली सं।
‘आजु करेजवा जुड़इहें, ईस्सर बाबा, पीहें रकतिया के धार हे’ अहाता के भीतऽरीये बांसवारी तर हवन कुंड में धुप दियाता। पंडीजी लोग स्वाहा स्वाहा उचारऽता। बड़ा शुभ माहावल बा। सभका चेहरा प खुशी बा। हरेक साल से बेहतर एह साल खोंसी भेंटाइल बा, आदमी के जुबान बोलेवाला खोंसी। तले एक बाएक लइकन के चिल्लहट आ लेलकारी माहावल के उदबेगलस। कलुवा आपन तेरुवार के
मंदिर के देवाल पर रगड़ के पिजा रहल बा। खोंसी के गर्दन में खूब सुन्नर माला पहिनावल बा। पूजारी जी के इशारा के इंतजार में बा कलुवा। सभ मेहरारू आंचर से आपन आधा मुंह तोपले निहार रहल बाड़ी। सबले पीछा बेचैन रजमतिया के लोर सुख गइल बा। आँख सूज गइल बा। एक बाएक खोंसी जोर से चिचियाइल… मेंऽऽ एंऽऽ …। सभे देखल। कलुवा हाथ में खून से सानल तेरुवार लेके हांफता। भुइंयां एक ओर खोंसी के मुड़ी आ धड़ अलगा-अलगा उछल रहल बा। खून के कुछ छिटिका पुजारी बाबा के पियरी धोती पर भी पड़ गइल बा। ‘धबाक’ से आवाज आइल। सभे पीछा घूम के देखल। रजमतिया बेहोश हो गइल रहे।
गाँव में सगरो शांति बा। दिन बीतल आ रातो बीत चुकल बा रजमतिया सभका से नजर बचाके दुपहरिया में मंदिर के अहाता में घुसल हीयऽ। दूरे से देखतिया कि ओकर खोंसी, ओकर परान, ओकर करेजा, जहां बलिदान भइल रहे, ओहिजा जियतार खड़ा बा। मुस्कुरा रहल बा। रजमतिया के मुर्दा मन में परान लवट आइल। ‘माई! हम मुवल नइखीं। देखऽ, हम अबहियों जियतानी। काहे की हम ईस्सर बाबा के बेटा हईं। तोहसे कहले रहनी नु कि हम बिहाने भइला जिन्दा हो जायेब।
रजमतिया खुशी से पगला के ओहिजे घिरिनिया नाचे लागल। राजस्थानी घूमर त कबो पंजाबी भांगड़ा के अंदाज में बड़ बड़ नचवइया के फेल करत रहे। तनिक देर ले सबकुछ बिसरा के खूब बिजोड़ नचलस। जब थाकल तबे रूकल आ धीरे धीरे हांफत बाकिर मुसकुरात बेटा के लगे गइल। खूब चुमलस। ‘ए माई! गाँव भर के पाप हमरा खून से धोवा के छेमा हो गइल बा। अब केहू के कवनो भारा चढ़ावे के जरुरत नइखे। मन शुद्ध त जीवन शुद्ध। जाके सभका से कह द, कि जे भी हमरा बात प भरोसा करी ऊ सबदिना खातिर फरल फुलाइल रही, जा।’
रजमतिया तीन हाली फेरु अपना लाल के माथा चुमलस आ गाँव भर के खुसखबरी सुनावे खातिर उठ के चल पड़ल। पुरवइया चमेली के खुशबू लेके मंद-मंद बहे लागल। आसमान में सुरुज के करिया घटा घेर के छोप लेलस। धरती प एगो अजगुते शांति पसर गइल। दू-चार डेग बढ़ के रजमतिया पीछा मुड़ के देखलस। खोंसी अपना जगहा से अलोपित हो गइल रहे। दउर के रजमतिया फेरु लवट परल बलि बेदी तर। नीचा माटी में ओही तरे सूखल खून अबहियों पसरल बा।  माला के छितराइल फूलन के पंखुड़ी से लगहीं लिखा गइल रहे – “स्वर्गानन्द” ।
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